इन्दिरा एकादशी 2026: पितरों को बैकुंठ धाम पहुँचाने वाला महाव्रत, जानिए व्रत कथा और प्रामाणिक पूजा विधि
पितृ पक्ष के दौरान आने वाली इन्दिरा एकादशी का सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस पावन व्रत से पितरों को मोक्ष और साधक को अमोघ पुण्य की प्राप्ति होती है।

इन्दिरा एकादशी 2026: पितरों को बैकुंठ धाम पहुँचाने वाला महाव्रत, जानिए व्रत कथा और प्रामाणिक पूजा विधि
पितृ पक्ष के दौरान आने वाली इन्दिरा एकादशी का सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस पावन व्रत से पितरों को मोक्ष और साधक को अमोघ पुण्य की प्राप्ति होती है।
सनातन धर्म में एकादशी तिथियों का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना गया है। वर्ष भर में आने वाली सभी चौबीस एकादशियां अपने आप में अद्वितीय फल प्रदान करने वाली होती हैं, परंतु जब कोई एकादशी पितृ पक्ष की अवधि के भीतर आती है, तो उसका महात्म्य कई गुना बढ़ जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इन्दिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस पावन व्रत का मुख्य उद्देश्य अपने दिवंगत पूर्वजों, पितरों को यमराज की यातनाओं से मुक्त कराकर उन्हें बैकुंठ धाम तक पहुँचाना होता है।
इन्दिरा एकादशी 2026 का पौराणिक महत्व और महिमा
शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति अपने परिवार के बिछड़े हुए पितरों की शांति और उनकी मुक्ति के लिए व्याकुल रहता है, उसके लिए इन्दिरा एकादशी का व्रत किसी वरदान से कम नहीं है। पुराणों में यहां तक उल्लेख मिलता है कि इस व्रत के प्रभाव से नरक में कष्ट भोग रहे पितर भी सीधे दिव्य लोक को प्रस्थान कर जाते हैं।
यदि आपके पूर्वज किन्हीं कारणों से अतृप्त हैं या उनके निमित्त सही प्रकार से श्राद्ध-तर्पण नहीं हो पाया है, तो पितृ पक्ष में पड़ने वाली इस एकादशी पर विधिवत अनुष्ठान करने से संपूर्ण पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है। सनातन संस्कृति में इसे पितरों के उद्धार का सबसे सरल और शक्तिशाली मार्ग माना गया है। अपने पितरों की शांति के लिए आप पितृ शांति, श्रीमद्भागवत-गीता संपूर्ण पाठ एवं श्वेत तिल-जौ से तर्पणपूजा ➔ का संकल्प ले सकते हैं, जिससे परिवार में सुख-शांति और पितृ आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
इन्दिरा एकादशी व्रत की प्रामाणिक पूजा विधि
व्रत के अनुष्ठान की शुरुआत दशमी तिथि से ही हो जाती है:
- दशमी तिथि के नियम: दशमी के दिन सूर्योदय के पश्चात सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और रात्रि में भोजन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। मन में पूरी तरह से ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करना आवश्यक है।
- एकादशी के दिन प्रात:स्नान: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदियों के जल से अथवा घर पर ही गंगाजल मिले जल से स्नान करें। स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें।
- भगवान शालिग्राम व विष्णु पूजन: अपने घर के ईशान कोण में चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और उनके स्वरूप शालिग्राम की प्रतिमा स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजन: भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। विशेष रूप से भगवान विष्णु को तुलसी दल अति प्रिय है, अतः भोग में तुलसी अवश्य शामिल करें।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ: पूजा के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जप करें और विष्णु सहस्रनाम या इन्दिरा एकादशी की पौराणिक कथा का श्रवण करें।
दिव्य प्राचीन स्थानों पर पितृ शांति विशेष एवं सर्व पितृ तर्पण महापूजापूजा ➔ का आयोजन किया जाता है, जिसमें सम्मिलित होकर आप अपने समस्त ज्ञात-अज्ञात पितरों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
इन्दिरा एकादशी व्रत कथा का सार
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सत्ययुग में महिष्मती नामक नगरी में इंद्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा राज करते थे। एक दिन उनके दरबार में महर्षि नारद का आगमन हुआ। राजा ने आदरपूर्वक मुनि को आसन दिया और उनसे अपने पितरों की स्थिति के बारे में पूछा।
महर्षि नारद ने अपनी योगदृष्टि से देखकर बताया कि हे राजन! आपके पिता अपने पूर्व जन्म में किए गए किसी पाप कर्म के कारण यमराज की सभा में कष्ट भोग रहे हैं और उन्होंने संदेश भेजा है कि उनका पुत्र आश्विन कृष्ण इन्दिरा एकादशी का व्रत रखे, जिसके पुण्य प्रभाव से उन्हें मुक्ति मिल जाएगी।
राजा इंद्रसेन ने विधि-विधान से अपनी रानी और सेवकों सहित इन्दिरा एकादशी का व्रत पूर्ण निष्ठा के साथ किया। इस व्रत के प्रभाव से आकाश से फूलों की वर्षा हुई और राजा के पिता Garuda पर सवार होकर बैकुंठ धाम को पधारे। तब से लेकर आज तक यह व्रत लोक कल्याण के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
पितृ पक्ष और एकादशी का समन्वित फल
चूंकि यह व्रत पितृ पक्ष के अंतर्गत आता है, इसलिए इस दिन ब्राह्मण भोज, गोदान और जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान करने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है। यदि आप व्यक्तिगत रूप से यज्ञ या अनुष्ठान करने में असमर्थ हैं, तो आप पितृ शांति, श्रीमद्भागवत-गीता संपूर्ण पाठ एवं श्वेत तिल-जौ महायज्ञपूजा ➔ के माध्यम से अपने पितरों का तर्पण करवा सकते हैं।
निष्कर्ष
इन्दिरा एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा और पितृ ऋण से उऋण होने का एक महाअवसर है। इस दिन सच्चे मन से किया गया पूजन आपके जीवन के सभी संकटों को दूर कर घर में धन-धान्य और वंश वृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
Q1. इन्दिरा एकादशी व्रत क्यों रखा जाता है?
इन्दिरा एकादशी व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति और दिवंगत पूर्वजों (पितरों) को यमलोक की यातनाओं से मुक्त कराकर बैकुंठ धाम पहुँचाने के लिए रखा जाता है।
Q2. इन्दिरा एकादशी के दिन किसकी पूजा की जाती है?
इस दिन जगत के पालनहार भगवान श्री विष्णु के साथ-साथ उनके शाश्वत स्वरूप शालिग्राम जी की पूजा की जाती है और पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है।
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