परिवर्तिनी एकादशी 2026: भगवान विष्णु के योगनिद्रा करवट बदलने का रहस्य और पद्मा एकादशी व्रत विधान
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी (पद्मा एकादशी) के पावन अवसर पर भगवान विष्णु के करवट बदलने का रहस्य, व्रत कथा और अचूक पूजा विधि जानें।

परिवर्तिनी एकादशी 2026: भगवान विष्णु के योगनिद्रा करवट बदलने का रहस्य और पद्मा एकादशी व्रत विधान
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी (पद्मा एकादशी) के पावन अवसर पर भगवान विष्णु के करवट बदलने का रहस्य, व्रत कथा और अचूक पूजा विधि जानें।
सनातन संस्कृति में एकादशी तिथियों का अनंत आध्यात्मिक महत्व है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी या पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष यह पावन व्रत 20 सितंबर 2026 को है। पुराणों के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में लीन होते हैं और चातुर्मास का आरंभ होता है। इसके पश्चात, भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन वे अपनी शयन मुद्रा में करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
श्रीमद्भागवत पुराण और पद्म पुराण में इस एकादशी का महात्म्य विस्तार से बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन जो भी साधक सच्चे मन से श्री हरि की आराधना करता है, उसके समस्त पूर्वकृत पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
परिवर्तिनी एकादशी 2026 का पौराणिक एवं आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के द्वार पर पहरा देने के लिए प्रवृत्त हुए थे, तब वामन अवतार धारण कर उन्होंने तीन पग में तीनों लोक नाप लिए थे। राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वरदान दिया था कि वे आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक पाताल लोक में निवास करेंगे। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस एकादशी के दिन भगवान अपनी योगनिद्रा में करवट बदलते हैं, इसलिए इसे पद्मा एकादशी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन माता लक्ष्मी ने भगवान के पद्म (कमल) रूपी चरणों की सेवा की थी।
इस पावन तिथि पर दिव्य प्राचीन स्थानों पर (Divya Prachin Sthano Pe) विशेष अनुष्ठान और यज्ञ आयोजित किए जाते हैं। जो भक्त अपने जीवन के कष्टों, पितृ दोष या आर्थिक संताप से मुक्ति पाना चाहते हैं, उनके लिए यह एकादशी किसी वरदान से कम नहीं है। जीवन की हर बाधा को पार करने के लिए भगवान विष्णु की आराधना के साथ-साथ आप पितृ शांति, श्रीमद्भागवत-गीता संपूर्ण पाठ एवं श्वेत तिल-जौ से तर्पणपूजा ➔ का संकल्प भी ले सकते हैं, क्योंकि इस समय पितृ पक्ष की बेला भी निकट होती है।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत की प्रामाणिक पूजा विधि
शास्त्रोक्त विधान के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी का व्रत दशमी तिथि की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है। व्रत के नियम और पूजन की चरणबद्ध विधि निम्नलिखित है:
- ब्रह्म मुहूर्त स्नान: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदियों के जल या गंगाजल मिले जल से स्नान करें और पीतांबर (पीले वस्त्र) धारण करें।
- संकल्प लें: घर के पूजा स्थल या ईशान कोण में चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
- षोडशोपचार पूजन: भगवान श्री हरि को पीले पुष्प, तुलसी दल, चन्दन, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। विशेष रूप से भगवान को मौसमी फल और पंजीरी का भोग लगाएं।
- विष्णु सहस्रनाम पाठ: पूजन के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जप करें और विष्णु सहस्रनाम या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
- तुलसी अर्चन: भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। अतः पूजन में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें, परंतु ध्यान रहे कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इन्हें एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लेना चाहिए।
यदि आपके जीवन में कोई जटिल पारिवारिक या पैतृक संपत्ति का विवाद चल रहा है, जिसके कारण मानसिक शांति भंग हो रही है, तो शास्त्रों में वर्णित विशेष उपायों का सहारा लें। आप इस संदर्भ में मां वाराही देवी तंत्रोक्त महायज्ञ एवं भू-संपत्ति विवाद निवारण अनुष्ठानपूजा ➔ के माध्यम से अपनी समस्याओं का शास्त्रीय समाधान प्राप्त कर सकते हैं।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्यराज था जो अत्यंत पराक्रमी और दानी था। उसने अपने बल से इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। सभी देवता घबराकर भगवान विष्णु की शरण में गए। तब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और बौने ब्राह्मण का वेष बनाकर राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे। बलि ने उनसे दान मांगने को कहा। वामन भगवान ने तीन पग भूमि मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह भगवान विष्णु हैं, फिर भी दानी बलि ने वचन दिया।
भगवान वामन ने अपने विराट रूप में एक पग से पृथ्वी और दूसरे पग से अंतरिक्ष को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में रख दिया। बलि की इस उदारता और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया और वचन दिया कि वे चातुर्मास में उनके द्वार पर पहरा देंगे। भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन भगवान ने शयन मुद्रा में करवट बदली थी, तभी से यह तिथि परिवर्तिनी एकादशी के रूप में पूजनीय हो गई।
एकादशी व्रत के अमोघ फल और सावधानियां
परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। मनुष्य के जाने-अनजाने किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन अन्न का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। फलाहार या निर्जला व्रत अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार रखना चाहिए।
संध्या समय पुनः भगवान विष्णु की आरती करें और रात्रि में जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें। जो लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और शत्रुओं पर विजय चाहते हैं, वे मां बगलामुखी अमोघ कवच पाठ, हल्दी अभिषेक, नींबू बलि एवं पीतांबरा महाहवनपूजा ➔ का लाभ ले सकते हैं। यह अनुष्ठान सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं को दूर करने में अत्यंत प्रभावी माना गया है।
निष्कर्ष
परिवर्तिनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं है, बल्कि यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक दिव्य माध्यम है। इस दिन भगवान विष्णु के करवट बदलने से ब्रह्मांड की ऊर्जा में सकारात्मक परिवर्तन आता है। अतः हमें इस पावन अवसर पर विधि-विधान से व्रत रखकर श्री हरि की कृपा प्राप्त करनी चाहिए।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
Q1. परिवर्तिनी एकादशी 2026 कब है?
परिवर्तिनी एकादशी का पावन व्रत 20 सितंबर 2026 को रखा जाएगा।
Q2. इस एकादशी को परिवर्तिनी क्यों कहा जाता है?
इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में अपनी करवट बदलते हैं (परिवर्तन करते हैं), इसीलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
Q3. परिवर्तिनी एकादशी पर किस देवता की पूजा की जाती है?
इस दिन जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रामाणिक विधि से पूजा की जाती है।
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