फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी 2026: द्विजप्रिय गणेश पूजन, शुभ मुहूर्त, प्रामाणिक व्रत कथा एवं विघ्न निवारण अचूक उपाय
फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। जानें इस पावन तिथि पर भगवान गणपति के द्विजप्रिय रूप के पूजन की शास्त्रोक्त विधि, चंद्रोदय समय, पावन कथा तथा जीवन के कष्टों को दूर करने के सिद्ध वैदिक उपाय।

फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी 2026: द्विजप्रिय गणेश पूजन, शुभ मुहूर्त, प्रामाणिक व्रत कथा एवं विघ्न निवारण अचूक उपाय
सनातन धर्म की पावन परंपरा में भगवान श्री गणेश जी को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता का स्थान प्राप्त है। किसी भी शुभ कार्य, अनुष्ठान या संकल्प की सिद्धि हेतु सर्वप्रथम गणेश जी का ही आह्वान किया जाता है। प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी' के रूप में अत्यंत श्रद्धा एवं नियमपूर्वक मनाया जाता है।
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को शास्त्रों में 'द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी' कहा गया है। यह पावन तिथि साधक के जीवन से समस्त संकटों, ऋण भार, रोग, भय तथा अज्ञात बाधाओं का समूल नाश करने वाली मानी गई है। इस दिन भगवान गणेश के 'द्विजप्रिय' स्वरूप की उपासना का विशेष विधान है, जिनकी भक्ति से साधक को ब्रह्मज्ञान, ऋद्धि-सिद्धि, दीर्घायु तथा अपार सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी (द्विजप्रिय संकष्टी) का शास्त्रोक्त महत्त्व
'मुद्गल पुराण' तथा 'गणेश पुराण' में वर्णित कथाओं एवं विधानों के अनुसार, भगवान गणेश का अष्टत्रिंशत् (32) स्वरूपों में से 32वां रूप 'द्विजप्रिय गणेश' है। 'द्विज' शब्द का अर्थ होता है दो बार जन्म लेने वाला—पहला शारीरिक जन्म तथा दूसरा ज्ञान व संस्कार के माध्यम से होने वाला आध्यात्मिक जन्म। ब्राह्मण, वेदपाठी एवं ज्ञान के साधक भगवान के इस रूप की विशेष आराधना करते हैं।
द्विजप्रिय गणेश जी के चार मस्तक (चतुर्मुख) तथा चार भुजाएं हैं। वे अपने हाथों में कमंडल, रुद्राक्ष माला, दंड और मोदक धारण किए हुए हैं। इनकी उपासना करने से मनुष्य को न केवल मानसिक शांति और तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त होती है, अपितु जीवन के जटिल से जटिल संकट भी क्षणभर में समाप्त हो जाते हैं। जो भक्त फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखकर रात्रि में चंद्रदेव को अर्घ्य समर्पित करते हैं, उनके कुल में दरिद्रता का वास कभी नहीं होता।
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथि, मुहूर्त एवं चंद्रोदय समय
फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी तिथि का व्रत एवं पूजन चंद्रोदय व्यापिनी तिथि में किए जाने का विधान है।
- फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 5 फरवरी 2026 को सायं 07:15 बजे से
- फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि समाप्त: 6 फरवरी 2026 को सायं 05:40 बजे तक
- संकष्टी चतुर्थी व्रत तिथि: 5 फरवरी 2026 (गुरुवार)
- चंद्रोदय समय (अर्घ्य देने का समय): रात्रि 09:22 बजे (स्थान भेद के अनुसार समय में आंशिक परिवर्तन संभव है)
- अभिजीत मुहूर्त: प्रातः 12:13 बजे से दोपहर 12:57 बजे तक
ध्यान दें: संकष्टी चतुर्थी का व्रत मुख्य रूप से चंद्र दर्शन और चंद्रदेव को अर्घ्य देने के पश्चात् ही पूर्ण माना जाता है। अतः 5 फरवरी 2026 को ही व्रत एवं रात्रि पूजन करना शास्त्रसम्मत है।
भगवान 'द्विजप्रिय गणेश' के स्वरूप का गूढ़ रहस्य
शास्त्रों में वर्णन आता है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म, दरिद्रता और अज्ञान का अंधकार बढ़ता है, तब-तब श्री गणेश अपने दिव्य रूपों में अवतरित होकर भक्तों का कल्याण करते हैं। द्विजप्रिय गणेश जी शांत, गौर वर्ण (अथवा स्वर्ण कांति युक्त) और अति सौम्य मुद्रा में विराजमान हैं।
- चतुर्मुख होना: चार मुख चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) का प्रतीक हैं। इनकी उपासना से साधक में विवेक, वाक्-सिद्धि और ज्ञान का संचार होता है।
- रुद्राक्ष एवं कमंडल: रुद्राक्ष तपस्या एवं शिव-तत्त्व का प्रतीक है, जबकि कमंडल पापनाशिनी गंगाजल और पवित्रता का प्रतीक है।
- मोदक: मोदक आनंद और महासुख का प्रतीक है, जो कठिन साधना के उपरांत प्राप्त होने वाले परम फल को दर्शाता है।
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी की संपूर्ण प्रामाणिक पूजन विधि
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी पर व्रत एवं पूजन की शास्त्रोक्त विधि नीचे दी गई है। इस विधि का श्रद्धापूर्वक पालन करने से अनंत गुना पुण्य फल प्राप्त होता है:
1. प्रातः काल नित्य कर्म एवं संकल्प
- सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान-ध्यान से निवृत्त हों। लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
- अपने घर के मंदिर की सफाई करें और एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
- चौकी पर भगवान श्री गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और कुशा लेकर संकल्प लें:
"मम सर्वपापक्षयपूर्वक सर्वकार्यसिद्धये फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी तिथौ द्विजप्रिय श्रीगणेशपूजनमहं करिष्ये।"
2. गणपति जी का षोडशोपचार पूजन
- भगवान गणेश जी को आचमन कराएं और गंगाजल से स्नान कराएं।
- पंचामृत (दूध, दही, घृत, शहद, शर्करा) से अभिषेक करें। पुनः शुद्ध जल से स्नान कराकर वस्त्र अर्पित करें।
- श्री गणेश को रोली, चंदन, सिंदूर, अक्षत तथा अष्टगंध का तिलक लगाएं। सिंदूर श्री गणेश को अत्यंत प्रिय है, अतः उनके मस्तक पर सिंदूर अवश्य लगाएं।
- दूर्वा अर्पण: 'ॐ गं गणपतये नमः' का उच्चारण करते हुए गणेश जी को 21 दूर्वा (दूब घास) की जोड़ियां (Pairs) अर्पित करें। ध्यान रखें कि दूर्वा हमेशा उनके चरणों में या मस्तक पर अर्पित की जाए, उनके पीठ पर नहीं।
- पुष्प एवं धूप-दीप: लाल गुड़हल का फूल या लाल गुलाब अर्पित करें। उत्तम धूप-दीप प्रज्वलित करें।
- नैवेद्य: बेसन के लड्डू, मोदक, तिल-गुड़ के मोदक, ऋतु फल (केला, अमरुद) और पंचमेवा का भोग लगाएं।
3. संध्या पूजन एवं चंद्रदेव को अर्घ्य दान
- संध्या समय पुनः स्नान या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- श्री गणेश जी के समक्ष दीपक जलाएं और फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
- आरती करें और 'गणेश अथर्वशीर्ष' या 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' का पाठ करें।
- रात्रि में चंद्रोदय के समय एक तांबे के पात्र में शुद्ध जल, कच्चा दूध, रोली, अक्षत, सफेद पुष्प और थोड़ा सा गुड़ मिलाएं।
- चंद्रदेव की ओर मुख करके धीरे-धीरे अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय नीचे दिए गए मंत्र का जप करें:
"क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिगोत्रसमुद्भव। गृहणाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिणीसहित शशिन॥"
- अर्घ्य के पश्चात् चंद्रदेव को प्रणाम करें, तीन बार अपने स्थान पर परिक्रमा करें और भगवान गणेश व चंद्रदेव से क्षमा प्रार्थना करें। तत्पश्चात् प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी की पावन पौराणिक व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवराज इंद्र के उद्यान में अत्यंत सुंदर और सुगंधित पुष्प खिले हुए थे। राजा भामंडल का एक अति पराक्रमी योद्धा नित्य रात्रि में आकाश मार्ग से आकर इंद्रदेव के उस सुरम्य उद्यान से पुष्प चुराकर ले जाता था। इसके कारण इंद्रदेव अत्यंत दुःखी और चिंतित रहते थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि देवलोक की सुरक्षा को भेदकर कौन पुष्प चुरा रहा है।
इंद्रदेव ने अपने सुरक्षाकर्मियों को कड़ा पहरा देने का आदेश दिया। एक दिन रक्षकों ने उस चोर को पकड़ने के लिए एक युक्ति निकाली। उन्होंने उद्यान के चारों ओर भगवान श्री गणेश के सिद्ध पावन दूर्वा एवं अक्षत छिड़क दिए। जब वह योद्धा रात्रि में आया और दूर्वा से आच्छादित भूमि पर चला, तो उसकी समस्त दिव्य शक्तियां और आकाशगामी विद्या लुप्त हो गई। रक्षकों ने उसे तुरंत बंदी बना लिया और राजा भामंडल तथा इंद्रदेव के समक्ष प्रस्तुत किया।
पूछताछ करने पर उसने स्वीकार किया कि वह राजा भामंडल का दूत है। राजा भामंडल ने जब इस घटना के बारे में सुना तो वे अत्यंत भयभीत हो गए। ऋषियों और ब्रह्मज्ञानी पंडितों ने राजा को बताया कि यह सब फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्थी तिथि के अनादर और अज्ञानता का परिणाम है। यदि राजा भामंडल और उनका दूत निष्ठापूर्वक भगवान 'द्विजप्रिय गणेश' की शरण में जाएं और फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी का निर्जला व्रत रखकर विधिवत पूजन करें, तो उनके समस्त अपराध और पाप भस्म हो जाएंगे।
राजा भामंडल ने फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी के दिन पूरे विधि-विधान से व्रत रखा, गणेश जी को 21 दूर्वा अर्पित की, कथा सुनी और रात्रि में चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया। भगवान द्विजप्रिय गणेश राजा के इस भक्तिभाव से अति प्रसन्न हुए। उन्होंने दूत को समस्त बंधनों से मुक्त कर दिया और राजा भामंडल को अखंड धन, राज्य, पुत्र-पौत्र तथा अंत समय में मोक्ष का वरदान प्रदान किया।
तभी से फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी का यह पावन व्रत संसार में सर्व संकट निवारक और मनोकामना पूरक के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
विघ्न निवारण एवं कष्ट मुक्ति हेतु सिद्ध अचूक उपाय
यदि आपके जीवन में लगातार रुकावटें आ रही हैं, व्यापार में घाटा हो रहा है, कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है या गृह क्लेश शांत नहीं हो रहा है, तो फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी के दिन इन सिद्ध उपायों को अवश्य करें:
1. भयंकर कर्ज व दरिद्रता से मुक्ति हेतु
संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः काल स्नान के पश्चात् श्री गणेश जी को 108 मोदक या तिल-गुड़ के लड्डू अर्पित करें। साथ ही 'ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र' का 11 बार पाठ करें।
यदि आपके जीवन में अत्यधिक आर्थिक तंगी और पुराना कर्ज बना हुआ है, तो सिद्ध पीठों पर माता लक्ष्मी और गणेश जी की कृपा हेतु महापूजा का संकल्प लें। 👉 [अष्टलक्ष्मी कर्ज मुक्ति महापूजा एवं अनुष्ठान] का ऑनलाइन संकल्प लेने हेतु यहाँ क्लिक करें: [/pujas/maa-ashta-lakshmi-karz-mukti-puja]
2. शत्रु बाधा, मुकदमों में विजय व तंत्र-बाधा निवारण
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश को शमी के 21 पत्ते और सिंदूर अर्पित करें। गणेश जी के सामने चमेली के तेल का दीपक जलाएं और 'ॐ गं गणपतये नमः' का 108 बार लाल चंदन की माला से जप करें। यदि शत्रुओं द्वारा बहुत अधिक मानसिक तनाव या व्यापारिक षड्यंत्र रचा जा रहा हो, तो मां बगलामुखी की विशेष आहुतियां अति फलदायी होती हैं। 👉 [माँ बगलामुखी मिर्ची हवन एवं कवच पूजा] का ऑनलाइन संकल्प लेने हेतु यहाँ क्लिक करें: [/pujas/maa-bagalamukhi-mirchi-hawan]
3. ग्रह दोष, शनि ढैय्या व साढ़ेसाती शांति हेतु
यदि आपकी कुंडली में शनि, राहू या केतु का अशुभ प्रभाव चल रहा है, जिसके कारण बनते काम बिगड़ जाते हैं, तो संकष्टी चतुर्थी के दिन गणेश जी को शमी पत्र, काले तिल और गुड़ अर्पित करें। इस दिन शनि देव और विघ्नहर्ता गणेश दोनों की आराधना से कष्टों से त्वरित राहत मिलती है। 👉 [शनि साढ़ेसाती एवं ढैय्या दोष शांति महापूजा] का ऑनलाइन संकल्प लेने हेतु यहाँ क्लिक करें: [/pujas/shani-saadesati-dhaiya-dosh-nivaran-yagya]
4. असाध्य रोग मुक्ति एवं उत्तम स्वास्थ्य हेतु
यदि घर में कोई सदस्य लंबे समय से बीमार है, तो संकष्टी चतुर्थी के दिन गणेश जी का दूध व दूर्वा रस से अभिषेक करें और 'महामृत्युंजय मंत्र' का जप करते हुए प्रार्थना करें। दिव्य तीर्थों पर किया गया अभिषेक रोगी को नवजीवन प्रदान करता है। 👉 [दिव्य प्राचीन स्थान पर महामृत्युंजय जाप एवं रुद्राभिषेक] का ऑनलाइन संकल्प लेने हेतु यहाँ क्लिक करें: [/pujas/mahamrityunjaya-jaap-rudrabhishekam]
श्री गणेश अथर्वशीर्ष पाठ का विशेष महत्त्व
संकष्टी चतुर्थी के दिन 'श्री गणेश अथर्वशीर्ष' का पाठ करना साक्षात वेदों की ऋचाओं का गान करने के समान माना गया है। अथर्ववेद में वर्णित इस स्तोत्र में स्पष्ट लिखा है:
"यः संकष्टी चतुर्थी तिथौ जपति स विद्यावान् भवति, स यशोधनवान् भवति।"
अर्थात्, जो व्यक्ति संकष्टी चतुर्थी की तिथि को गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करता है, वह परम विद्यावान्, कीर्तिवान् और अपार धन-धान्य से संपन्न हो जाता है। यदि संभव हो तो इस दिन 21 बार अथर्वशीर्ष का पाठ करें और प्रत्येक पाठ के साथ गणेश जी को एक-एक दूर्वा समर्पित करें।
दिव्य सिद्ध पीठों पर वैदिक अनुष्ठान का अद्भुत महत्त्व
शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, सामान्य दिनों की तुलना में पर्व और तिथियों पर किए गए पूजा-पाठ का फल अनंत गुना अधिक होता है। विशेषकर जब पूजा सिद्ध पीठों, पवित्र सिद्ध तीर्थ क्षेत्रों तथा दिव्य प्राचीन स्थानों पर वेदोक्त विधि से संपन्न कराई जाती है, तो उसकी तरंगें साधक के संपूर्ण जीवन को सकारात्मकता से भर देती हैं।
यदि आप व्यस्तता, दूरी या स्वास्थ्य कारणों से स्वयं तीर्थ क्षेत्रों में उपस्थित होकर अनुष्ठान कराने में असमर्थ हैं, तो दिव्यायज्ञम (DivyaYagyam) आपके नाम, गोत्र और विशिष्ट मनोकामना के साथ प्रामाणिक वेदपाठी आचार्यों द्वारा शास्त्रोक्त पूजन संपन्न कराता है। पूजा का संपूर्ण वीडियो प्रमाण एवं सिद्ध प्रसाद आपके घर तक निष्ठापूर्वक पहुंचाया जाता है।
निष्कर्ष
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी (द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी) केवल एक व्रत नहीं, अपितु जीवन के समस्त विघ्नों को समाप्त कर नई चेतना और समृद्धि प्राप्त करने का दिव्य अवसर है। 5 फरवरी 2026 को पड़ने वाली इस पावन तिथि पर भगवान द्विजप्रिय गणेश जी का ध्यान करें, नियमपूर्वक पूजन करें, चंद्रदेव को अर्घ्य दें और पवित्र भाव से समर्थ अनुसार दान-पुण्य करें। प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता श्री गणेश आपके जीवन के समस्त संकटों को दूर कर सुख, शांति एवं समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करेंगे।
॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
Q1. फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी 2026 में कब है?
फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी (द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी) का व्रत 5 फरवरी 2026, दिन गुरुवार को रखा जाएगा।
Q2. फाल्गुन संकष्टी चतुर्थी 2026 पर चंद्रोदय का समय क्या है?
5 फरवरी 2026 को संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय का समय रात्रि 09:22 बजे रहेगा। अलग-अलग शहरों में समय में 5 से 10 मिनट का अंतर हो सकता है।
Q3. द्विजप्रिय गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए क्या अर्पित करना चाहिए?
द्विजप्रिय गणेश जी को 21 दूर्वा की जोड़ियां, सिंदूर, लाल गुड़हल के फूल, शमी पत्र और बेसन या तिल-गुड़ के मोदक अर्पित करना अति शुभ माना जाता है।
Q4. क्या संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन करना अनिवार्य है?
हाँ, संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन और चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किए बिना अधूरा माना जाता है। अर्घ्य देने के उपरांत ही पारण किया जाता है।
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